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स्वैच्छिक रामधारीसिंह दिनकर -24-Apr-2023

डा रामधारी सिंह दिनकर 



डा. रामधारी  सिंह दिनकर ये नाम सुनते ही जेहन में आती है वो छवि उनकी जो स्वतंत्रता पूर्व एक विद्रोही कवि  के रूप में स्थापित हो चुके थे 


सवतंत्रता बाद उन्हें भारत के प्रथम राष्ट्रीय  कवि  की उपाधि से नवाजा गया 


वे छायावाद कवियों की पहेली पीढ़ी के कवि  थे 


एक और जहाँ उनकी कविताओं में आज ,विद्रोह,आक्रोश,और क्रांति की पुकार रहती थी वंही दूसरी और कोमल श्रृंगारिक भावनाओं की भी अभिव्यक्ति भी थी जो  हमको उर्वशी में चरमोत्कर्ष  में  काव्यकृति में देखने को मिलती है 


 स्वतंत्रता के बाद १९५२ में गठित पहली संसद में उन्हें राजयसभा के लिए चुना गया ,स्वभाव से शांत और सौम्य थे 


व्यक्तित्व बहुत मृदुभाषी था  ,पर जब बात आती थी देश हित की वो कभी चुप नहीं बैठते थे ,भरी संसद में भी उहने सरकार  की जो नीतियां  पसंद नहीं अति थी उनके खिलाफ मुखालफत करते थे 


१९६२ में चीन युद्ध के बाद जब भरी संसद में ये कविता पथ किया सबका सर शर्म से झुक गया 



रे रोक युधिष्ठिर को न यहाँ जाने दे 


उनको स्वर्गधीर  फिर दे हमें  गांडीव 


गदा लौटा दे अर्जुन भीमवीर 



ऐसे मूर्धन्य  विद्वान ,कवि ,खंडकाव्य लेखक निबंधकार और समीक्षाकार  श्री दिनकर जी के जीवन परिचय पर भी एक नजर 


श्री दिनकरजी का जन्म  २३ सितबर १९०८ को सिमरिया घाट के बेगूसराय जिले में हुआ था ,पिता सामान्य किसान थे उनका नाम रवि सिंह और माता का नाम मनरूप देवी था 


उन्होंने संस्कृत,उर्दू,अंग्रेजी  मैथिली और बांग्ला का गहन  अध्ययन  किया 


बी.ए  . करने के बाद की  अध्यापक नौकरी कर ली ,विवाह बचपन में हो गया था और वे एक पुत्र के पिता भी बन गए थे 


कालांतर में बिहार सरकार  में सब रजिस्ट्रार ,फिर प्रकार विभाग में उपनिदेशक पद पर भी कार्य किया 

 

उसके बाद उन्हें भागलपुर विश्विद्यालय  का कुलपति नियक्त किया ,स्वतन्त्र हुआ देश  में वे भारत सरकार  के पहले हिंदी सलाहकार चुने गए और १९५२ में गठित पहली संसद में  राजयसभा  के सदस्य बने भारत सर कार 

 द्वारा उन्हें पदम् विभूषण की उपाधि से  अलंकृत किया  गया 

उनकी प्रमुख पुस्तक संस्कृति  भी शामिल हैं के ४  अध्याय के लिए उन्हें साहित्य अकादमी  पुरुस्कार और उनके काव्य ग्रन्थ उर्वशी जो की एक  शृंगार  रस  पर आधारित काव्य है जिसमे उर्वशी देवलोक की परीतक्या  अप्सरा   विरह,प्रेम का वर्णन 

चरमोत्कर्ष के साथ किया गया ,ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला 

द्वापर  युग  की ऐतिहासिक घटना महाभारत पर  आधारित उनके प्रबन्ध काव्य कुरुक्षेत्र  को  विश्व के १००   श्रेष्ट 

काव्यों में ७४ वन स्थान प्राप्त हुआ 

राजयसभा  में चुने जाने के बाद भी उनकी  काव्य रचना  रुकी नहीं और ज्यादा ओजस्व और वीर  रस से  भरी 

रचनाये रेणुका,हुंकार,रसवंती,के साथ द्वंदगीत  भी रचे गए 

इसके अलावा उनके महान  ग्रन्थ में परशुराम की प्रतीक्षा  और रश्मिरथी  भी शामिल हैं 


२४ अप्रैल १९७४ को इनकी मृत्यु  से भारत ने  एक श्रेष्ठ विद्वान                    

साहित्यकार  को  खो दिया  

उनको शत शत नमन            


             
अपराजिता शर्मा 
                                                           

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ये रचना  मौलिक और अप्रकाशित है

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6 Comments

Varsha_Upadhyay

27-Apr-2023 05:07 PM

👏👌

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Abhinav ji

25-Apr-2023 09:11 AM

Very nice 👍

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Gunjan Kamal

24-Apr-2023 10:19 PM

शानदार प्रस्तुति 👌🙏🏻

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